मुंबई। इस साल मानसून ने कई रिकॉर्ड को नेस्तनाबूद कर दिया है। देश में औसत से 10 फीसद ज्यादा बरसात हुई है और मानसून की अवधि भी काफी लंबी रही है। आमतौर पर 15 सितंबर के बाद मानसून की विदाई हो जाती है, लेकिन अभी भी मानसून अपने पूरे शबाब पर है। मानसून देर से आया लेकिन दुरुस्त आया और जमकर बरसा। आमतौर पर केरल के तट से एक जून को मानसून टकराता है, लेकिन इस बार एक हफ्ते की देरी से आठ जून को मानसून ने दस्तक दी थी। लेकिन अब मानसून विदा होने में देरी कर रहा है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में तो आफत की बरसात हो रही है। बिहार की राजधानी पटना समेत कई शहर बाढ़ में बेबस नजर आ रहे हैं। लोगों के घरों से लेकर दुकान, बाजार और अस्पतालों तक में पानी भरा हुआ है। मौसम विभाग के अनुसार जून-सितंबर के दौरान हुई बरसात किसानों के लिए काफी फायदेमंद है।
ज्यादा बरसात से किसानों को सर्दी में बोए जाने वाली फसलों का रकबा बढ़ाने में काफी मदद मिलेगी। गेहूं, सरसो और चने की खेती के लिए बरसात बहुत फायदेमंद है। इससे पैदावार में इजाफा होगा। पैदावार बढ़ने से किसानों को धन की कमी नहीं होगी। किसान खुशहाल होंगे तो ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ेगी और ग्रामीण क्षेत्र में मांग का असर देश की अर्थव्यवस्था में दिखाई देगा।
देश की अर्थव्यवस्था की चाल बहुत हद तक ग्रामीण इलाकों की मांग पर निर्भर करती है। यह बरसात आमतौर पर सूखे का सामना करने वाले क्षेत्रों के लिए अमृत की बूंदों के समान है। इससे तालाबों में पानी की मात्रा बढ़ेगी, भूजल का स्तर बढ़ेगा, जिससे देश के कई क्षेत्रों में लोगों को पानी के संकट से निजात मिलेगी। हालांकि, भारी बरसात से गर्मी के मौसम में बोए जाने वाली फसलों को नुकसान भी पहुंचा है। कपास, सोयाबीन और दाल की फसलें पक कर लगभग तैयार हैं ऐसे में ज्यादा बरसात से उनके उत्पादन पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।